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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 4
मिथः केशाकेशिप्रधननिधनास्तर्कघटनाः बहुश्रद्धाभक्ति प्रवणविषयाश्चाप्तविधयः। प्रसीद प्रत्यक्षीभव गिरिसुते ! देहि शरणं निरालम्बं चेतः परिलुठति पारिप्लवमिदम् ।।
तार्किक सिद्धान्तियों के पारस्परिक वाद-विवाद रूपी प्रधन (युद्ध) अन्त में उन्हें कुछ प्राप्त न होकर आयु की समाप्ति ही करवाता है। स्वरूप-साक्षात्कार-संपत्र आप्तपुरुषों के शास्त्र तो बहुत ही श्रद्धा तथा भक्ति की शक्ति पर निर्भर हैं। मैं तो उपर्युक्त दोनों बातें करने का साहस नहीं रखता हूं। अतः हे गिरिजे! मुझ पर आप प्रसन्न बनिये, अर्थात् अनुग्रह कीजिये, उस के पश्चात् मेरे नेत्रों का विषय बनिये और फिर मेरी संपूर्ण रक्षा कीजिये, क्योंकि संकल्प-विकल्प-रूपी उपद्रवों से युक्त बना हुआ मेरा आश्रयहीन मन लुढ़कता रहता है अर्थात् स्वरूपविश्रांति प्राप्त करने से वंचित रहता है।
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