हे भगवती! सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि आदि सभी प्रकाश आपकी रश्मियों के कण-मात्र हैं। परिपूर्ण शिव रूप ब्रह्म भी आपके महान् तेज के सामने क्षुद्र अर्थात् तुच्छ बना हुआ उस आपके अगाध तेज का एक कण है - यह तो मैंने समझ लिया है। इसके अतिरिक्त शिव तत्त्व से लेकर पृथ्वी तक सभी तत्त्व भी त्रिवलयाकार कुण्डलिनी के बीच में ठहरे हुए हैं। इस प्रकार आपका आश्चर्यपूर्ण स्वरूप आपके भक्त के हृदय में अनुभव किया जाता है।
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