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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 36
असंख्यैः प्राचीनैर्जननि ! जननैः कर्मविलया- द्गते जन्मन्यन्ते गुरुवपुषमासाद्य गिरिशम्। अवाप्याज्ञां शैवीं क्रमतनुमपि त्वां विदितवान् नयेयं त्वत्पूजास्तुतिविरचनेनैव दिवसान् ।।
हे माता! पूर्वकालीन अनन्त जन्मों में देव-नर-पशु-पक्षी आदि शरीरों को धारण करते-करते निरर्गल आपकी अनुग्रहमयी शक्ति से, कर्मफलों के समाप्त होने पर यह अन्तिम जन्म मैंने प्राप्त किया है। इस मोक्षप्राप्ति-प्रद जन्म में भगवान् शंकर को गुरु के रूप में प्राप्त करके, उन शिवरूप गुरु-देव से शैवी दीक्षा से संयुक्त होकर आप परमेश्वरी की क्रमरूपता का अर्थात् आपके नरशक्ति-शिवात्मक त्रिकरूपता का साक्षात्कार करके इस अन्तिम जन्म के शेष दिन आपकी पूजा और स्तुति करते-करते ही बिता दूँ।
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