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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 13
मनुष्यास्तिर्यञ्च्चो मरुत इति लोकत्रयमिदं भवाम्भोधौमग्नं त्रिगुणलहरी कोटिलुठितम्। कटाक्षश्चेदत्र क्वचन तव मातः ! करुणया शरीरी सद्योऽयं व्रजति परमानन्दतनुताम् ।।
हे माता! मनुष्य-वर्ग, पशु-वर्ग तथा विद्याधर गन्धर्वादि देव-वर्ग-इस प्रकार के ये सभी तीनों प्राणी-गण संसाररूपी अगाध समुद्र में डूब गये हैं तथा सत्वादि गुणत्रय वृत्तियों के सुख, दुःख, मोह रूपी लहरों की धाराओं में लुढ़कते रहते हैं। अब यदि इनमें से किसी एक प्राणी पर भी आपकी दया-पूर्ण दृष्टि पड़े तो वह देहधारी प्राणी उसी क्षण परमानन्द-दशा को प्राप्त करता है अर्थात् निरावरण चिदाकाश-रूपता को प्राप्त करता है।
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