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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 21
विधे विद्ये वेद्ये विविधसमये वेदजननि ! विचित्रे विश्वाद्ये विनयसुलभे वेदगुलिके !! शिवाज्ञे शीलस्थे शिवपदवदान्ये शिवनिधे ! शिवे मातर्मह्यं त्वयि वितर भक्तिं निरूपमाम् ।।
हे समस्त जगत् का निर्माण करने वाली माता! हे विधि-स्वरूप सृष्टिकारिणी! हे विद्या-चतुष्टय रूपी देवी! हे स्वात्मरूपता से जानने योग्य! हे अनन्त प्रकार के आचरणों वाली! हे तीन वेदों की उत्पत्ति करने वाली! हे विचित्ररूप अर्थात् अत्यन्त अद्भुतरूप बनी हुई! हे जगत की आद्य अर्थात् समस्त संसार का बीज बनी हुई! हे विनय अर्थात् कौल आदि शास्त्रों के द्वारा सहज ही प्राप्त होने वाली देवी! हे समस्त वेदों का सार बनी हुई! हे स्वच्छन्द नाथ शिव की आज्ञा बनी हुई अर्थात् पांच प्रकार के शास्त्र का स्वरूप बनी हुई! हे अपने स्वातंत्र्यनाम वाले शील महिमा में ठहरने वाली भगवती । सच्चिदानन्दरूप शिव-पद को देने वाली हे देवी! ऐहिक और पारलौकिक कल्याणों की कोषरूपा अर्थात् हे सभी जनों को सुख देने वाली भगवती! हे महादेव शंकर भगवान् की अर्धाङ्गिनी! मुझे अपने स्वरूप में अनुरक्त बना दीजिए अर्थात् मुझे अपना अनुपम दास बनाइये।
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