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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 14
प्रियङ्गश्यामाङ्गीमरुणतरवासः किसलयां समुन्मीलन्मुक्ताफल बहुलनेपथ्य कुसुमाम्। स्तनद्वन्द्वस्फारस्तबकनमितां कल्पलतिकां सकृद्धयायन्तस्त्वां दधति शिवचिन्तामणि पदम् ।।
हे माता! आप अभीष्टप्राति-पद होने के फलस्वरूप एक कल्प-मञ्जरी के समान सुशोभित बनी हुई हैं, जिस लता के मुख-हाथ आदि सभी अंग मानो प्रियंगु नामक लता की तरह श्याम वर्ण वाली टहनियां हैं। अत्यन्त लाल दिव्य वस्त्र अत्यन्त कोमल पत्ते हैं। चमकता हुआ मोतियों और रत्नों का समूह मानों उस लता के फल बने हुए हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार की वेशभूषा उसके पुष्प हैं और (ज्ञान क्रिया पूर्ण) विकसित दो पुष्ट स्तन मानो उस कल्पमंजरी के झुके हुए फूलों के गुच्छे हैं - इस प्रकार आप के स्वरूप को पूर्णरूपेण ध्यान करने वाले भक्त, परमशिव-घामात्मक चिन्तामणि-पदवी को प्राप्त करते हैं।
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