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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 17
कलां प्रज्ञामाद्यां समयमनुभूतिं समरसां गुरुं पारम्पर्य विनयमुपदेशं शिवकथाम्। प्रमाणं निर्वाणं परममतिभूतिं परगुहां विधिं विद्यामाहः सकलजननीमेव मुनयः ।।
मुनिजन, समस्त संसार को उत्पन्न करने वाली आप परापारमेश्वरी भगवती को ही 'कला' अर्थात् अनाश्रितशिव नाम वाली शक्ति कहते हैं, 'आद्या प्रज्ञा' अर्थात् स्वतन्त्र चमत्कारमयो पर प्रतिभारूपिणी शक्ति कहते हैं, 'समय' शिव शक्ति सामरस्यात्मक अवस्था कहते हैं, समरसामनुभूति अहन्ता तथा इदन्ता से रहित अनुत्तर- अकुल में ठहरी हुई चमत्कृति का नाम-करण देते हैं, गुरुं पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्ति कहते हैं, गुरु परंपरा कहते हैं, विनय तन्त्र प्रधान शाख अचवा सच्चिदानन्द-स्वरूप-स्वात्मस्थिति के नाम से विभूषित करते हैं, शाम्भवोपाय, शाक्तोपाय और आणवोपाय-इन तीन मार्गों का स्वरूप कहते हैं, शिवात्मक परामर्श रूप कहते हैं, आप भगवती को ही मुनिजन पर प्रमातृ रूप परम-प्रमाण और परम-मोक्ष रूप परम निर्वाण करके विभूषित करते हैं इसके अतिरिक्त आप जगज्जननी को ही मुनिजन विधिरूप और महामन्त्रमयो विद्या कहते हैं।
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