हे पराकुण्डलिनी रूप माता! जब कोई भाग्यशाली भक्त इस सूर्य सोमात्मक प्राणापान रूपी द्वन्द्र का ग्रास करता हुआ अनन्त काल से अविदित मध्य-धाम अर्थात् सुषुम्ना-मार्ग में प्रकाश तथा विमर्श का आश्रय लेकर प्रवेश करता है और इसी प्रकार चित्त प्रलय रूपी अग्नि से अर्थात् हठ पाक प्रशम धारणा से समस्त भेद-प्रचात्मक जगत् का संहार करके ऊर्ध्वकुण्डलिनों की पदवी में प्रवेश करता है तो फिर आपको तीव्रातितीव्र अनुग्रह शक्ति से वह व्यक्ति सदा के लिए परमशिवात्मक अकुल-धाम में प्रवेश करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।