हे जगज्जननी मां! सृष्टि के आरम्भ में पहिले आप राजा दक्षप्रजापति की पुत्री बन गईं। उसके पश्चात् दोष-युक्त उस प्रजापति का त्याग करके हिमालय की कन्या बनीं। आप यदि तत्त्वदृष्टि से भगवान् शंकर से अभिन्न होकर आदि और अन्त से रहित भी हैं तथापि उस शंकर भगवान् के साथ विवाह करके उनकी पत्नी बन गईं। इस प्रकार के आप के लीलामय चरित को कौन जान सकता है अर्थात् आपका लीलामय-स्वातंत्र्य सर्वथा अगम्य है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।