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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 28
सुता दक्षस्यादौ किल सकलमातस्त्वमुदभूः सदोषं तं हित्वा तदनु गिरिराजस्य तनया। अनाद्यन्ता शम्भोरपृथगपि शक्तिर्भगवती विवाहाज्जायासीत्यहह चरितं वेत्ति तव कः ।।
हे जगज्जननी मां! सृष्टि के आरम्भ में पहिले आप राजा दक्षप्रजापति की पुत्री बन गईं। उसके पश्चात् दोष-युक्त उस प्रजापति का त्याग करके हिमालय की कन्या बनीं। आप यदि तत्त्वदृष्टि से भगवान् शंकर से अभिन्न होकर आदि और अन्त से रहित भी हैं तथापि उस शंकर भगवान् के साथ विवाह करके उनकी पत्नी बन गईं। इस प्रकार के आप के लीलामय चरित को कौन जान सकता है अर्थात् आपका लीलामय-स्वातंत्र्य सर्वथा अगम्य है ।
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