परानन्दाकारां निरवधिशिवैश्वर्य वपुषं निराकारज्ञान प्रकृतिमनवच्छिन्न करुणाम्। सवित्रीं लोकानां निरतिशयधामास्पदपदां भवो वा मोक्षो वा भवतु भवतीमेवभजताम् ।।
हे माता ! परम आनन्द-स्वरूप से युक्त, अगाध तथा अनन्त शिवैश्वर्य संपन्न, विश्वोत्तीर्ण निराकार, ज्ञान-स्वरूप तथा सदैव पूर्ण करुणामयी, तीनों लोकों की उत्पत्ति करने वाली और उत्तमोत्तम शिव-धाम में ठहरी हुई आप परापारमेश्वरी को, जो भक्तजन स्मरण करते हैं, उन्हें सांसारिक भोगों की प्राप्ति हो अथवा परम - आनन्द रूप मोक्ष-प्राप्ति हो, उन्हें दोनों एक तुल्य हैं। तात्पर्य यह है कि उनके लिए सांसारिक भोग भी मोक्ष पर ही पर्यवसित रहते हैं।
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