जो इच्छाज्ञानक्रिया के शिवशक्त्यात्मक अवस्था में षड्दलरूपी कमल उदित-रूपता में विकास करता है, उस षट्कोण में जो योनि के आकार में कर्णिका है, उसी के बीच में ओंकार का पीठ है, उस पीठ पर ऊर्ध्व-कुण्डलिनी का स्वरूप धारण करती हुई श्यामवर्णवाली ज्ञान-क्रियात्मक स्तनयुगलों से जगदानन्द-पदवी को ओर प्रसारित होती हुई समस्त विश्व को शिवरूपता में प्रकट करती हुई महात्रिपुरसुन्दरी को मैं सदा के लिए प्रणाम करता हूँ अर्थात् उसमें समावेश करता हूँ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।