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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 37
यत्षट्पत्रं कमलमुदितं तस्य या कर्णिकाख्या योनिस्तस्याः प्रथितमुदरे यत्तदोंकारपीठम् । तस्मिन्नन्तः कुचभरनतां कुण्डलीतः प्रवृत्तां श्यामाकारां सकलजननीं सन्ततं भावयामि ।।
जो इच्छाज्ञानक्रिया के शिवशक्त्यात्मक अवस्था में षड्दलरूपी कमल उदित-रूपता में विकास करता है, उस षट्कोण में जो योनि के आकार में कर्णिका है, उसी के बीच में ओंकार का पीठ है, उस पीठ पर ऊर्ध्व-कुण्डलिनी का स्वरूप धारण करती हुई श्यामवर्णवाली ज्ञान-क्रियात्मक स्तनयुगलों से जगदानन्द-पदवी को ओर प्रसारित होती हुई समस्त विश्व को शिवरूपता में प्रकट करती हुई महात्रिपुरसुन्दरी को मैं सदा के लिए प्रणाम करता हूँ अर्थात् उसमें समावेश करता हूँ।
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