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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 10
कुलं केचित्प्राहुर्वपुरकुलमन्ये तव बुधाः परे तत्सम्भेदं समभिदधते कौलमपरे। चतुर्णामप्येषामुपरि किमपि प्राहुरपरे महामाये ! तत्त्वं तव कथममी निश्चिनुमहे ।।
हे स्वातंत्र्यशक्तिशालिनी महामाया भगवती। कई बुद्धिमान्जन आपके स्वरूप को कुल अर्थात् पारमेश्वरी शक्ति कहते हैं। अन्य विद्वान् तांत्रिकसंप्रदाय-शाली, आपको अकुल अर्थात् शिव के नाम से पुकारते हैं। अन्य त्रिक-आदि दर्शनवादी आपका स्वरूप उभयात्मक कुलाकुल रूप अर्थात् शिव-शक्ति-सामरस्यात्मक कहते हैं और कई प्रत्यभिज्ञादर्शन-वादी आपको कौल-नाम की उपाधि से विभूषित करते हैं। अन्य विद्वान् तो इन उपर्युक्त चारों स्वरूपों से उत्तीर्ण आपको अनाख्य-स्वरूप ही कहते हैं। हे माता! आप ही बताइये कि ये हम सभी आपके स्वरूप का निश्चय किस रूप से करेंगे।
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