हे देवी! अनुत्तर परमशिव के साथ अभिन्न होने से आप आदि और अन्त से रहित अभेदात्मक प्रेम में रसिक होकर भी, हिमालय के घर में जन्म लेने से पूर्व, पाणि-ग्रहण के समय भगवान् शंकर जी की अर्धागिनी बनीं। इसके अतिरिक्त सकलादि समस्त प्राणियों को उत्पन्न करने वाली होकर भी, जो आप हिमालय पर्वत की कन्या बनकर प्रकट हुई, अर्थात् जगत्जननी होकर भी आप हिमालय की पुत्री बन गईं। इस प्रकार का वैषम्य देखकर यही अनुमान लगाया जाता है कि आप का शिव के साथ पाणि-ग्रहण करके गृहिणी बनना तथा हिमालय के घर जन्म लेना एक विनोदमय शृङ्गाररसपूर्ण नाटक-सुख ही है अर्थात् जन्मग्रहण तथा दम्पतीभाव का संपादन रूप संसार, एक आप की सुखमय लीला है।
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