मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 6
अनाद्यन्ताभेदप्रणयरसिकापि प्रणयिनी शिवस्यासीर्यत्त्वं परिणयविधौ देवि ! गृहिणी। सवित्री भूतानामपि यदुदभूः शैलतनया तदेतत्संसारप्रणयनमहानाटकसुखम् ।।
हे देवी! अनुत्तर परमशिव के साथ अभिन्न होने से आप आदि और अन्त से रहित अभेदात्मक प्रेम में रसिक होकर भी, हिमालय के घर में जन्म लेने से पूर्व, पाणि-ग्रहण के समय भगवान् शंकर जी की अर्धागिनी बनीं। इसके अतिरिक्त सकलादि समस्त प्राणियों को उत्पन्न करने वाली होकर भी, जो आप हिमालय पर्वत की कन्या बनकर प्रकट हुई, अर्थात् जगत्जननी होकर भी आप हिमालय की पुत्री बन गईं। इस प्रकार का वैषम्य देखकर यही अनुमान लगाया जाता है कि आप का शिव के साथ पाणि-ग्रहण करके गृहिणी बनना तथा हिमालय के घर जन्म लेना एक विनोदमय शृङ्गाररसपूर्ण नाटक-सुख ही है अर्थात् जन्मग्रहण तथा दम्पतीभाव का संपादन रूप संसार, एक आप की सुखमय लीला है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें