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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 34
प्रविश्य स्वं मार्ग सहजदयया देशिकदृशा । षडध्वध्वान्तौघच्छिदुरगणनातीत करुणाम्। परानन्दाकारां सपदि शिवयन्तीमपि तनुं स्वमात्मानं धन्याश्चिरमुपलभन्ते भगवतीम् ।।
पराशक्ति भगवती के शक्तिपात से पवित्र बने हुए भाग्यशाली भक्त-जन सहजदयामय सद्गुरु के कटाक्ष से अपने परमधाम में प्रविष्ट होकर स्वात्म- स्वरूपात्मिका भगवती को सदा के लिए प्राप्त करते हैं, जो भगवती समस्त षडध्वारूपी अन्धकार को काटने से अत्यन्त करुणामयी है और क्षणमात्र में भक्त की आत्मा को शिवमय बनाती है और इसीलिए परानन्द रूप बनी हुई है।
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