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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 11
षडध्वारण्यानों प्रलय रविकोटिप्रतिरुचा रुचा भस्मीकृत्य स्वपदकमलप्रह्वशिरसाम्। वितन्वानः शैवं किमपि वपुरिन्दीवररुचिः कुचाभ्यामानम्रः शिवपुरुषकारो विजयते ।।
प्रलयकालीन करोड़ों सूर्यों के समान दीप्ति से षडध्वा रूपी अर्थात् वर्णाध्वा, मन्त्राध्वा, पदाध्वा, कलाध्बा, तत्त्वाध्वा और भुवनाध्वा, अथवा मूलाधार, नाभि, हृदय, कंठ, घूमध्य और सहस्रार-इन छः प्रकार से बने हुए घने जंगल को जलाकर अर्थात् भस्म करके अपने प्रकाश विमर्शमय परमधाम में तदूप बने हुए योगियों को (भक्त-जनों को) सर्वोत्तीर्ण अलौकिक परमशिव-धामात्मक स्वरूप दिखाते हुए भैरवात्मक शिव पुरुषकार की जय हो, जो भैरव-पुरुषार्थ संकोच विकासशील होने से नील-उत्पल के समान है और ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति को प्रचुरता से अपने शिवात्मक स्थान से पृथ्वीतत्त्व तक नम्र अर्थात् फैला हुआ है।
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