हे माता! जिस भांति भगवान् सूर्य की किरणें उसी से उदित होकर उसी में लय होती हैं, जिस प्रकार अग्नि की चिंगारियां अग्नि से उदय करके उसी में समाप्त होती हैं और जिस भांति ऊर्मिसंतति से युक्त महान् समुद्र से जल की बून्दै उसी से उदित होकर उसी में चली जाती हैं अर्थात् समा जाती हैं ठीक उसी भांति अपने-अपने तत्त्व संबन्धी श्रेणियों सहित ये सभी छत्तीस तत्त्व आप पारमेश्वरी भगवती से उदित होकर प्रत्येक प्रलयकाल में आपके स्वरूप में विवश होकर समा जाते हैं अर्थात् आपके स्वरूप में ही लय होते हैं।
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