हे कुण्डलिनी-शक्ति-स्वरूप वाली भगवती! (आप) चार पत्तों वाले कमल-स्थान मूलाधार में अवस्थित षद्दल अर्थात् षडाकार भगपुट (षट्कोण) में साढ़े तीन वलयों (पेरों) में मुड़ी हुई होकर देदीप्यमान् बनी हुई हैं। उस सुप्तावस्था में आप दस लाख बिजली, अग्नि तथा सूर्य-प्रकाश के समान चमकती हुई ठहरी हैं। वहां आप अपने कुंडलिनी-स्वरूप का उत्थान करने के लिए प्रथम स्वाधिष्ठान षड्दलात्मक कमल को नादात्मक शूल से काट कर, उसके पश्चात्, मणिपूर नाम वाले दशदल-स्वरूप कमल को, फिर अनाहत चक्र वाले द्वादश कमल को तत्पश्चात् विशुद्ध-चक्रात्मक पोडशदल रूपी कमल का भेदन करके अन्त में आज्ञाचक्रस्थान के द्विदलात्मक कमल में प्रवेश करती हैं उसी द्विदलात्मक आज्ञा चक्र में ठहरी हुई आपको मैं प्रणाम करता हूँ। उसी आपकी उच्चतम अवस्था में समावेश करता हूँ।
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