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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 2
वचस्तर्कागम्यस्वरसपरमानन्दविभव- प्रबोधाकाराय द्युतिदलितनीलोत्पलरुचे। शिवस्याराध्याय स्तनभरविनम्राय सततं नमो यस्मै कस्मैचन भवतु मुग्धाय महसे ।।
आपके उस अत्यन्त सुन्दर, अत्यन्त अलौकिक तेज को नमस्कार हो, जो वाणी और तर्क से जाना नहीं जाता, जिसका स्वरूप स्वानुभव-गम्य परमानन्दात्मक ऐश्वर्य को सजग बनाता है, जो अपनी संविद्-रश्मियों से ही नील-पीत आदि समस्त वस्तु-वर्ग को विकसित करता है जैसे सूर्य-प्रकाश से उत्पल-पुष्प विकसित होते हैं, जो प्रकाश ज्ञान-क्रियात्मक स्तनों के गौरव से विनम्र है अर्थात् सदैव विश्वमयरूपता को प्रकट करता है और जिस परम-तेज की आराधना भगवान् शंकर करते रहते हैं। भर विनम्र शब्द का तात्पर्य है कि अलौकिक प्रकाश सदैव विश्वमयरूपता को प्रकट करता है।
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