आपके उस अत्यन्त सुन्दर, अत्यन्त अलौकिक तेज को नमस्कार हो, जो वाणी और तर्क से जाना नहीं जाता, जिसका स्वरूप स्वानुभव-गम्य परमानन्दात्मक ऐश्वर्य को सजग बनाता है, जो अपनी संविद्-रश्मियों से ही नील-पीत आदि समस्त वस्तु-वर्ग को विकसित करता है जैसे सूर्य-प्रकाश से उत्पल-पुष्प विकसित होते हैं, जो प्रकाश ज्ञान-क्रियात्मक स्तनों के गौरव से विनम्र है अर्थात् सदैव विश्वमयरूपता को प्रकट करता है और जिस परम-तेज की आराधना भगवान् शंकर करते रहते हैं। भर विनम्र शब्द का तात्पर्य है कि अलौकिक प्रकाश सदैव विश्वमयरूपता को प्रकट करता है।
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