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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 25
तडिद्वल्लीं नित्यामऽमृत सरितं पाररहितां मलोत्तीर्णां ज्योत्स्नां प्रकृतिमगुणग्रन्थिगहनाम् । गिरां दूरां विद्यामविनतकुचां विश्वजननी- मपर्यन्तां लक्ष्मीमभिदधति सन्तो भगवतीम् ।।
हे माता! सन्त-जन आपको सदा रहने वाली बिजली की रेखा के समान, बिना तटों के अमृत-नदी-तुल्य, कलंक-रहित, चांदनी के सदृश, सत्त्व आदि गुण रूपी ग्रन्थियों से रहित प्रकृति के समान, वाणी का अविषय बनी हुई विद्या के तुल्य, ज्ञानक्रिया-रूपी स्तनयुग्मों के अविनत होकर भी अर्थात् ज्ञानक्रिया-शक्तियों के बहिर्भावावस्था न प्राप्त करते हुए ही जगत् की उत्पत्ति करने वाली माता के समान, तथा न समाप्त होने वाली लक्ष्मी के समान अर्थात् मोक्ष लक्ष्मी रूपा वर्णन करते हैं।
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