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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 15
षडाधारावर्तेरपरिमितमन्त्रोर्मिपटलैश्चलन्मुद्राफेनैर्बहुविधलसदैवत झषैः। क्रमस्त्रोतोभिस्त्वं वहसि परनादामृतनदी भवानि ! प्रत्यग्रा शिवचिदमृताब्धिप्रणयिनी ।।
हे पार्वती। आप नित्य नवीन पूर्णाहन्ता रूपी अमृत-नदी को धारण करती हैं, जिसमें षट्-चक्राधार रूपी भंवर अवस्थित हैं, अनन्त मन्त्र रूपी लहरों की तरह विद्यमान हैं, स्पन्दमान् करङ्किणी आदि योग-मुद्रा रूपी झाग दृष्टिगोचर है, अनेक प्रकार के दिव्य दर्शन रूपी मगरमच्छ इसमें स्थित हैं और नियमित क्रम से अभ्यास करना ही जिस नदी का प्रवाह है-इस प्रकार यह अमृत नदी चिदानन्दात्मक शिव रूपी अमृत-सागर से प्रेम करती है, अर्थात् उस अमृत-सागर में तन्मय बनने के लिए वेग से उसकी ओर बहती रहती है।
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