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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 30
त्वया यो जानीते रचयति भवत्यैव सततं त्वयैवेच्छत्यम्ब ! त्वमसि निखिला यस्य तनवः। गतः साम्यं शम्भुर्वहति परमं व्योम भवती तथाप्येवं हित्वा विहरति शिवस्येति किमिदम्।।
हे माता! जो शिव आपकी ही परापरारूपिणी ज्ञान-शक्ति से समस्त प्रमाण-प्रमेयादि जगत् को जान लेता है, आपकी ही अपराशक्ति-रूपा क्रियाशक्ति से इस जगन्मण्डल की रचना करता है और आपकी ही परारूपा इच्छा शक्ति से इस जगत् को फिर से अपने स्वरूप में लय करके संहत करता है। इसके अतिरिक्त जिस शिव की सभी आठ मूर्तियां आप ही बनी हुई हैं, इस प्रकार जो शिव आपके स्वरूप साम्य को प्राप्त हुआ परमाकाशरूप शून्य-धाम में चला गया है, अर्थात् सदा के लिए आपके स्वरूप में लीन होकर अपनी सत्ता समाप्त करता है, ऐसा होकर भी आप इस शिव की अनाख्य रूपता को छोड़कर इसके साथ फिर से विहार करती है यह तो क्या है? अर्थात् यह आपकी लीला मुझे आश्चर्य चकित कर देती है।
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