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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 3
लुठद्‌गुञ्जाहारस्तन भरनमन्मध्यलतिकामुदञ्चद्धर्माम्भः कणगुणितनीलोत्पलरुचम्। शिवं पार्थत्राणप्रवणमृगयाकारगुणितं शिवामन्वग्यान्तीं शवरमहमन्वेमि शवरीम् ।।
इन्द्रकीलगिरि पर पाशुपत-अस्त्र-प्राप्ति के लिए तपस्यां करते हुए अर्जुन की रक्षा करने के हेतु आखेट-क्रिया करते हुए शिकारी का रूप शिवजी ने धारण किया था, अत एव शिवजी के शरीर से उष्ण २ स्वेद-कण निकलते थे मानो उसके नील-रंग वाले शरीर पर वे स्वेद-कण नील-कमल के समान चमकते थे। ऐसे ही शिकारी का रूप धारण करते हुए शिव के पीछे-पीछे शिकारिन का रूप धारण करती हुई पार्वती जी दौड़ती चली जाती थी जिस पार्वती जी को दौड़ने के कारण घुंघचियों की माला वक्षस्थल पर हिलती हुई इधर-उधर वक्षस्थल के दोनों ओर से लुढ़कती थी, और उसके वक्षस्थल के भार भोझ से उसकी कमर झुकी हुई थी - ऐसी ही रूप वाली शिकारिन पार्वती जी की शरण मैं लेता हूं अर्थात् उसमें समावेश करता हूं।
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