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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 8
तडित्कोटिज्योतिद्युतिदलितषङ्गन्धिगहनं प्रविष्टं स्वाधारं पुनरपि सुधावृष्टिवपुषा । किमप्यष्टात्रिंशत्किरणसकली भूतमनिशं भजे धाम श्यामं कुचभरनतं बर्बरकचम् ।।
जो तेज, अपने करोड़ों बिजलियों के प्रकाश की कान्ति से (सभी) छः चक्रों का वेधन करता है, तथा परमानन्द रूपी अमृतवर्षा से युक्त ऊर्ध्वकुण्डलिनी का स्वरूप धारण करके फिर से अपने आधार अर्थात् मूलाधार-स्थान में प्रवेश करता है - इस प्रकार जिस तेज ने अठतीस किरणों को सोम, सूर्य तथा अग्नि - इन तीन प्रकाशों की अठतीस कलाओं को अपने स्वरूप में लीन किया है और इसौलिए इन तीन तेजों की संघटनात्मक अवस्था धारण करने के फलस्वरूप जो तेज, श्याम-वर्ण वाला बन गया है, तथा ज्ञान क्रिया रूपी स्तनों के विमर्शनात्मक बोझ से जो तेज जगदानन्द रूपी अवस्था की ओर झुका हुआ है, एवं इस रीति से जिस तेज ने अपने अनन्त विश्व-व्यापी शक्ति-चक्र को विकसित किया है, उसी अलौकिक परम-धामात्मक तेज की मैं वन्दना करता हूं अर्थात् उसमें सदा के लिए समाविष्ट होता हूं।
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