हे माता! पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, आत्मा, चन्द्रमा और सूर्य, जिन्होंने संसार-मण्डल-वर्ती सभी कार्य-वर्ग को अपने स्वरूप में समाया है - ऐसे इन स्वरूपों के विकास से आपके स्वरूप की महानता कितनी है - इसका अनुमान कोई भी व्यक्ति नहीं लगा सकता। इसके अतिरिक्त आप की महिमा इतनी अगाध है कि ये सभी आठ मूर्तियां आपके अपरिमित परमाकाश भूमि में इतनी छोटी और सूक्ष्म अवस्था को प्राप्त होती हैं कि उस आपके परमाकाश भूमि में कहीं भी और किसी प्रकार से दृष्टिगोचर नहीं होती अर्थात् उसी आपके स्वरूप के अथाह समुद्र में बुलबुलों की तरह समा जाती हैं।
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