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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 38
भुवि पयसि कृशानौ मारुते खे शशाङ्के सवितरि यजमानेऽप्यष्टधा शक्तिरेका। वहति कुचभराभ्यां या विनम्रापि विश्वं सकलजननि ! सात्वं पाहि मामित्यवश्यम् ।। इति शिवम् । पञ्चमः सकलजननीस्तवः समाप्तः ।।
हे समस्त जगत् को उत्पन्न करने वाली माता! आप, चिच्चमत्कृतिमयो स्वातंत्र्यशक्ति एक होकर भी विश्वमयदशा में पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य और आत्मा - इन आठ स्वरूपों में विकसित हुई हैं। यद्यपि आप अपने ही ज्ञानक्रियात्मक स्तनरूपी रश्मिचक्रों की व्याप्ति से अपने विश्वव्यापी असंख्यशक्तियों से झुकी भी हैं, तथापि ऐसा होकर भी आप समस्त जगत् की सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह करने का कार्य अनायास में ही धारण करती हैं। इत्यतः मुझे भी अवश्य धारण करके रक्षा कीजिये अर्थात् अपने अनुत्तर धाम में प्रविष्ट करायें।
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