हे माता! आप सृष्टिरूप कृत्य की अधिष्ठात्री (ब्रह्मा) बन कर जगत् को उत्पन्न करती हैं, स्थितिरूप कृत्य की अधिष्ठात्री (विष्णु) बनी हुई इस भव-अभव तथा अति भवात्मक संसार का पालन करती हैं, संहृति रूप कृत्य की अधिष्ठात्री (रुद्र) नाम से विभूषित होकर इसका संहार करती हैं, तिरोधानकर्म की अधिष्ठात्री अर्थात् ईश्वरदशा को धारण करके इस समस्त जगत् का विधान करती है और सदाशिव-संज्ञा पाकर आप इस जगत् के सभी पाश-आणव आदि मल काटकर इसका अनुग्रह करती है। हे पर्वतराज पुत्री! इस प्रकार आप वास्तव में एक स्वरूप वाली होकर भी सृष्टि-स्थिति-संहार-विलय और अनुग्रह करती हैं। हे पर्वतराज पुत्री! इस प्रकार आप वास्तव में एक स्वरूप वाली होकर भी सृष्टि-स्थिति-संहार-विलय और अनुग्रह रूपी पांच कृत्यों को धारण करके अनेक बन जाती हैं, अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव इन पांच कारणों का स्वरूप धारण करती हैं।
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