मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 23
विरिञ्च्याख्या मातः ! सृजसि हरिसंज्ञा त्वमवसि त्रिलोकीं रुद्राख्या हरसि विदधासीश्वरदशाम्। भवन्ती सादाख्या शिवयसि च पाशौघदलिनी त्वमेवैकाऽनेका भवसि कृतिभेदैर्गिरिसुते ।।
हे माता! आप सृष्टिरूप कृत्य की अधिष्ठात्री (ब्रह्मा) बन कर जगत् को उत्पन्न करती हैं, स्थितिरूप कृत्य की अधिष्ठात्री (विष्णु) बनी हुई इस भव-अभव तथा अति भवात्मक संसार का पालन करती हैं, संहृति रूप कृत्य की अधिष्ठात्री (रुद्र) नाम से विभूषित होकर इसका संहार करती हैं, तिरोधानकर्म की अधिष्ठात्री अर्थात् ईश्वरदशा को धारण करके इस समस्त जगत् का विधान करती है और सदाशिव-संज्ञा पाकर आप इस जगत् के सभी पाश-आणव आदि मल काटकर इसका अनुग्रह करती है। हे पर्वतराज पुत्री! इस प्रकार आप वास्तव में एक स्वरूप वाली होकर भी सृष्टि-स्थिति-संहार-विलय और अनुग्रह करती हैं। हे पर्वतराज पुत्री! इस प्रकार आप वास्तव में एक स्वरूप वाली होकर भी सृष्टि-स्थिति-संहार-विलय और अनुग्रह रूपी पांच कृत्यों को धारण करके अनेक बन जाती हैं, अर्थात् आप ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव इन पांच कारणों का स्वरूप धारण करती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें