हे पर्वतराज पुत्री! यह चेतन पुरुष केवल पृथ्वी आदि पांच भूतों से निर्मित बने हुए अपने शरीर को वेदकरूपता से और सुख तथा दुःख की वेद्यरूपता से जान लेता है अर्थात् पांच भौतिक जड़ शरीर पर आत्माभिमान धारण करता है। इत्यतः आपके रहस्यमय गुरु-मुख से वश्चित बना हुआ यह देहधारी अपने शरीर का आत्माभिमान छोड़ने के लिये समर्थ नहीं होता, यद्यपि उसे भली-भांति यह ज्ञान है कि यह मेरा शरीर जड़ ही है।
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