हे परापारमेश्वरी शक्ति! इस समस्त सर्वतत्त्वमय जगत् को लयचिन्तन-धारणा से अपनी पांच भौतिक देह में लीन करके, उस अपने शरीर को भी अपने चित्प्रकाशरूपी हृदय में ठहरा कर हृदयस्थान में प्रवेश कराकर, तत्पश्चात् उस हृदय को पुरुष प्रमाण-प्रमेय-उपाधि-युक्त प्रमाता में मिला कर तदनन्तर वह प्रमाता भी प्रमेयादि-उपाधिरहित प्रकाशात्मक बिन्दु में नियुक्त करके, उसके बाद परप्रकाशात्मक बिन्दु भी पर-नाद अर्थात् अहं परामर्शात्मक गंभीर स्थान में पहुंचाकर, अर्थात् निद्रा और जाग्रत की बीच वाली तुर्यरूपा अवस्था में ले जाकर, तत्पश्चात् उस तुर्यरूप अवस्था को भी पारमार्थिक ज्ञानरूपी परमानन्द के ऐश्वर्य में अर्थात् जगदानन्द रूप अवस्था में लय करके जो जगदानन्द उत्तमोत्तम महान अनुत्तर प्रकाश स्वरूप है, वहां पहुंच कर जो व्यक्ति आप के स्वतंत्र चिदानन्द-घन स्वरूप का साक्षात्कार करता है उसकी जय हो।
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