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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 35
शिवस्त्वं शक्तिस्त्वं त्वमसि समया त्वं समयिनी त्वमात्मा त्वं दीक्षा त्वमयमणिमादिर्गुणगणः। अविद्या त्वं विद्या त्वमसि निखिलं त्वं किमपरं पृथक्तत्त्वं त्वत्तो भगवति ! न वीक्षामह इमे ।।
हे सर्वैश्वर्यसंपन्ना माता! आप ही शिव हैं, आप अनुग्रहकारिणी शक्ति हैं, आप ही सृष्टि आदि द्वादशदेवी-चक्रों में ठहरी हुई विधि अर्थात् उपाय बनी हुई हैं, आप ही समयिनी अर्थात् उन अनाख्य-विधियों का संचालन करने वाली हैं (प्रत्येक अनाख्य-विधियों से साधक को मध्य-धाम में ले जाने वाली हैं), आप ही आत्मा हैं, आप ही आत्म-ज्ञान देने वाली और पाशों को नष्ट करने वाली दीक्षा हैं, ये अणिमादि आठ सिद्धियां भी आप ही हैं, स्वरूप-अख्याति रूपिणी अविद्या और स्वरूप-विकास रूप विद्या भी आप ही हैं। वह कौन सी वस्तु है जो आप नहीं है। आपकी अनुग्रहशक्ति से पवित्र बने हुए हम आपके भक्त आपके स्वरूप से भित्र कुछ भी नहीं देखते हैं।
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