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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 7
बुबन्त्येके तत्त्वं भगवति ! सदन्ये विदुरस- त्परे मातः ! प्राहुस्तव सदसदन्ये सुकवयः। परे नैतत्सर्वं समभिदधते देवि ! सुधिय- स्तदेतत्त्वन्माया विलसितमशेषं ननु शिवे ।।
हे स्वातन्त्र्यशालिनी देवि । कई बुद्धिमान् जन आपके स्वरूप को सत् रूप और कई असत्-स्वरूप अर्थात् वाणी तथा मन का विषय न होने के फलस्वरूप शून्यात्मक कहते हैं। हे परा-शक्ति-रूप माता। कई विद्वान् जन आपका स्वरूप सदसदुभयात्मक कहते हैं, यानी आपका स्वरूप साकार रूप भी है और नियकाररूप भी है। इसके अतिरिक्त कई ज्ञानी-जन कहते हैं कि तत्वदृष्टि से यह कुछ ही नहीं है अर्थात् आपका स्वरूप अनुलेख्य होने से न सत् है, न असत् और न सदसदूप है। इससे मुझे यह अनुमान होता है कि हे पार्वती जी। यह ऊपर वर्णित आपके सभी लक्षण आपकी अप्रतिहता स्वातंत्र्य-शक्ति की केवल क्रीड़ा है और कुछ नहीं है।
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