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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 31
पुरः पश्चादन्तर्बहिरपरिमेयं परिमितं परं स्थूलं सूक्ष्मं सकुलमकुलं गुह्यमगुहम् । दवीयो नेदीयः सदसदिति विश्वं भगवतीं सदा पश्यन्त्याज्ञां वहसि भुवनक्षोभजननीम् ।।
हे भगवती! सामने, पीछे, भीतर, बाहर, अनन्त, परिमित, पर, स्थूल, सूक्ष्म, साकार, निराकार, गुप्त, प्रकट, अत्यन्त दूर, समीप, सत् और असत्-इस प्रकार के सारे संसार को जो आपके भक्त-जन "ईं" अर्थात् कामकला का स्वरूप ही देखते हैं। उनके लिये तो आप अपनी उत्तमोत्तमा आज्ञा अर्थात् अनुग्रह धारण करते हैं जिसके फलस्वरूप वे आपके भक्त, समस्त भुवनों की अङ्गनाओं को (शक्तियों) चलायमान करते हैं। भाव यह है कि वे भक्त समस्त संसार पर शासन करते हैं।
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