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पञ्चस्तवी • अध्याय 5 • श्लोक 18
प्रलीने शब्दौघे तदनु विरते बिन्दुविभवे ततस्तत्त्वे चाष्टध्वनि बपुरुपाधिन्युपरते। श्रिते शाक्ते पर्वण्यनुकलितचिन्मात्रगहनां स्वसंवित्ति योगी रसयति शिवाख्यां परतनुम् ।।
अनथक अभ्यास करता हुआ योगी जब स्वात्म-समावेश की ओर अग्रसर होता है तो प्रथम में उसे दस प्रकार के शब्दों का समूह प्रादुर्भूत होता है। उन समस्त शब्दों के लय होने के पश्चात् विन्दु-विभव अर्थात् अनन्त प्रकारों वाला प्रकाश-पुंज अनुभव होने लगता है, उसके भी शान्त होने के पश्चात् अपने आचारस्थान हृदय में आठ प्रकार के दिव्य शब्द प्रकट होते हैं। उनके भी उपरत होने पर योगी शक्ति, व्यापिनी और समना रूपी परा शक्ति के स्थान पर पहुंच जाता है। तदनन्तर ही यह भाग्यशाली योगी उस स्वात्म-संवित्ति का अनुभव करता है जो चिदानन्द-परामर्श से पूर्ण तथा परापारमेश्वरी का पारमार्थिक परस्वरूप है।
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