Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 3 — विभूति पाद
योगसूत्र
55 श्लोक • केवल अनुवाद
अपने चित्त को किसी भी एक स्थान पर (नाभि, हृदय या माथे पर) बाँधना, लगाना, ठहराना, या केन्द्रित करना धारणा कहलाती है।
जहाँ जिस स्थान पर भी धारणा का अभ्यास किया गया है, वहाँ पर उस ज्ञान या चित्त की वृत्ति की एकरूपता या उसका एक समान बने रहना ही ध्यान कहलाता है।
जब योगी स्वयं के स्वरूप को भूलकर केवल ध्येय (जिसका ध्यान कर रहा है) में ही लीन हो जाता है, तब योगस्थ साधक की वह अवस्था-विशेष समाधि कहलाती है।
अष्टांग योग के अंतिम तीन अंगों (धारणा, ध्यान व समाधि) का किसी एक ही विषय में अभ्यास करना संयम कहलाता है।
संयम (धारणा-ध्यान-समाधि) पर विजय प्राप्त करने से योगी की बुद्धि समाधि परक प्रकाश से आलोकित हो जाती है।
संयम का विशेष अभ्यास या प्रयोग योग की अलग- अलग भूमियों या अवस्थाओं में करना चाहिए। पहले स्थूल भूमियों पर अभ्यास करके उत्तरोत्तर सूक्ष्म भूमियों पर संयम करना चाहिए।
साधन पाद में अष्टांग योग के प्रकरण में कहे गए यम, नियम, आसन, प्राणायाम व प्रत्याहार की अपेक्षा ये तीन धारणा, ध्यान व समाधि (जिनकी संयम परिभाषा) सम्प्रज्ञात समाधि के निकटतम साधन हैं।
वह धारणा, ध्यान व समाधि भी निर्बीज अथवा असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त करने के लिए बाहरी साधन हैं।
चित्त निरोध की अवस्था समय में चित्त व्युत्थान और निरोध इन दोनों ही संस्कारो से संयुक्त होता है। इसे ही चित्त के निरोध का परिणाम कहा गया है।
निरोध संस्कारों के प्रभाव से योगी के चित्त की स्थिति पूर्णतः शान्त हो जाती है। अर्थात उस अवस्था में योगी का चित्त शान्त एवं सहज गति के साथ प्रवाहमान रहता है।
चित्त की योग से अतिरिक्त जो तीन भूमियाँ है, क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त उसका नाश और एकाग्र भूमि का निरन्तर बढ़ते हुए निरुद्ध अवस्था का उदय होना, चित्त के लिए समाधि का परिणाम है।
चित्त के समाधि परिणाम के बाद एक वस्तु या ध्येय विषयक पूर्व ज्ञान शांत होकर पुनः उसी समान ज्ञान का उदय होना चित्त का एकाग्रता परिणाम होता है। इसमें ध्येय का ज्ञान बीच में खंडित होने पर भी अखंडित महसूस होता है।
जिस प्रकार पूर्व के सूत्रों में चित्त के जो निरोध, समाधि व एकाग्रता परिणाम महर्षि द्वारा कहे गए हैं, उसी प्रकार सभी पंच महाभूतों व इन्द्रियों में होने वाले धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम व अवस्था परिणाम भी समझे जाने चाहिए।
किसी भी पदार्थ के अतीत, वर्तमान व भविष्यत धर्मों में जो एक तत्त्व सदा विद्यमान रहता है वह धर्मी है ।
एक परिणाम का किसी अन्य परिणाम के पश्चात होना "क्रम" है। क्रम का भिन्न होना परिणाम के भिन्न भिन्न होने में कारण है।
किसी भी पदार्थ के तीनों परिणाम (धर्म, लक्षण व अवस्था) में संयम (धारणा-ध्यान-समाधि) करने से उस पदार्थ के भूत एवं भविष्य काल का ज्ञान हो जाता है।
शब्द एवं उसके अर्थ एवं ज्ञान का परस्पर जुड़ाव होने से वे एक दुसरे के साथ मिले हुए जैसे प्रतीत होते हैं तब उनके विभाग (अलग-अलग) में संयम (धारणा-ध्यान-समाधि) करने से सभी प्राणियों के शब्दों का ज्ञान हो जाता है ।
योगी द्वारा अपने संस्कारों में संयम (धारणा-ध्यान और समाधि) करने से उसे अपने पूर्व जन्म के बारे में ज्ञान हो जाता है ।
योगी जब अपने से भिन्न व्यक्ति के चित्त में संयम करता है तो उसे दुसरे व्यक्ति के चित्त के भावों का ज्ञान हो जाता है।
लेकिन योगी को दुसरे व्यक्ति के चित्त के भावों का ज्ञान सामान्य ज्ञान की प्रक्रिया के आलंबन से रहित होता है क्योंकि योगी के संयम का विषय तो दुसरे व्यक्ति का केवल चित्त है।
जब योगी स्वयं के शरीर के रूप में संयम कर लेता है तो उससे दूसरे व्यक्तियों की आँखों का रोशनी के साथ सम्बन्ध टूट जाता है, जिससे उनकी योगी के शरीर को देखने की शक्ति रुक जाती है । इस कारण योगी का शरीर एक प्रकार से अदृश्य हो जाता है ।
शीघ्र या विलम्ब से फल देने वाले कर्मशयों में संयम करने से मृत्यु या मृत्यु का ज्ञान कराने वाले संकेतों का योगी को पूर्व ज्ञान हो जाता है ।
मैत्री, करुणा, मुदिता इन तीन चित्त की प्रसन्नता करने वाले उपायों में संयम (धारणा-ध्यान और समाधि का अभ्यास करने से) इन तीनों भावों में अतिशय बल की प्राप्ति होती है ।
अलग- अलग प्रकार के बलों में संयम करने से योगी को हाथी, गरुड़, वायु आदि के समान अलग- अलग प्रकार के बलों की प्राप्ति हो जाती है ।
जब योगी द्वारा मन की प्रकाशमय प्रवृत्ति में संयम किया जाता है । तब उसे जो वस्तु या पदार्थ दिखाई नहीं देते, जो किसी आवरण या पर्दे के अन्दर हैं या किसी दूर देश में स्थित हैं । उन सभी वस्तुओं या पदार्थों का उसे भली- भाँति ज्ञान हो जाता है ।
शरीर से बाहर स्थित सूर्य में संयम करने से योगी को सभी लोक – लोकान्तरों का ज्ञान हो जाता है ।
चन्द्रमा अथवा चाँद में संयम करने से सभी तारों की ठीक ठीक स्थिति की जानकारी हो जाती है ।
ध्रुव तारे में संयम करने से अन्य तारा समूह की गति का ज्ञान हो जाता है ।
पेट के मध्य में स्थित नाभिप्रदेश (नाभिचक्र) में संयम करने से योगी को पूरे शरीर की संरचना या बनावट का ज्ञान हो जाता है ।
कण्ठकूप में संयम करने से योगी को साधनाकाल में भूख- प्यास के ऊपर पूर्ण रूप से नियंत्रण आ जाता है ।
कूर्म (गले से नीचे उदर स्थल में कछुए की आकार की नाड़ी होती है) नामक नाड़ी में संयम करने से योगी को स्थिरता की प्राप्ति होती है ।
कपाल प्रदेश में स्थित मूर्ध ज्योति के प्रकाश में संयम करने से सिद्ध योगियों को देखने या जानने की योग्यता आती है ।
प्रातिभ नामक ज्ञान के उत्पन्न होने से योगी के भीतर अन्तःप्रज्ञा निःसृत होने से उसे सब प्रकार का ज्ञान हो जाता है ।
हृदय चक्र अर्थात हृदय प्रदेश में संयम करने से योगी अपने चित्त के स्वरूप को ठीक ठीक जान लेता है ।
बुद्धि और पुरुष दोनों स्वरुप से ही एक दुसरे से पुर्णतः भिन्न या अलग- अलग हैं । इन दोनों को अभिन्न अर्थात एक ही मानना ‘भोग’ कहलाता है । इसमें बुद्धि का विपरीत ज्ञान कारण है । इससे भिन्न जो स्वार्थ अर्थात केवल पुरुष के विषय में ही संयम करने से आत्मा का ज्ञान होता है ।
उस पुरुष में संयम करने से प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद व वार्ता जैसी सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं ।
वे सभी प्रातिभ, श्रावण, वेदन, आदर्श, आस्वाद और वार्ता नाम की छ: सिद्धियाँ समाधि की प्राप्ति में विध्न उत्पन्न करती हैं, लेकिन व्युत्थान दशा अर्थात जिसमें चित्त योग की स्थिति में नहीं रहता, में यह सिद्धियाँ हैं ।
कर्म के बन्धनों के रुकने से व मन के संस्कारों की गति का अच्छी प्रकार ज्ञान होने पर मन दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर लेता है । यह पर शरीर गमन नामक सिद्धि है।
उदान नामक प्राण पर विजय प्राप्त करने के बाद योगी जल, कीचड़ व काँटो के प्रभाव से रहित हो जाता है ।
समान नामक प्राण पर विजय प्राप्त करने से योगी के शरीर में तेजस्विता आ जाती है।
कानों एवं आकाश के परस्पर सम्बन्ध में संयम करने से योगी के दिव्य श्रोत अथवा सुनने की दिव्य क्षमता की प्राप्ति होती है । जिस शक्ति के द्वारा वह सूक्ष्म से सूक्ष्म शब्दों को भी सहजता से सुनने में सक्षम हो जाता है ।
शरीर व आकाश तत्त्व के परस्पर सम्बन्ध में संयम करने और रुई जैसे बहुत ही हल्के पदार्थों में संयम करने से योगी का शरीर और चित्त उन्ही पदार्थों की तरह हल्का और सूक्ष्म हो जाता है, जिससे उसे आकाश में गमन करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है ।
शरीर के साथ सम्पर्क होते हुए भी मन का शरीर से बाहर के पदार्थों के साथ व्यापार होता है । वह महाविदेहा नामक धारणा कहलाती है । इस धारणा से ज्ञान के प्रकाश पर पड़ने वाले आवरण का नाश हो जाता है ।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश ये पांच महाभूत होते हैं । पञ्च महाभूतों की स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व रूप से पांच विभाग हैं । इन सभी विभागों में एक साथ या क्रम से संयम करने पर योगी सभी पञ्च महाभूतों पर विजय प्राप्त कर लेता है ।
पञ्च भूतों पर विजय प्राप्त करने के बाद योगी को अणिमा आदि अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है ।और शरीर का विशेष सामर्थ्य बढ़ता है और साथ ही पृथ्वी आदि पञ्च भूतों के धर्म योगी को किसी भी प्रकार से बाधा नहीं पहुंचाते हैं ।
पञ्च महाभूतों में संयम करने के बाद योगी को ऐश्वर्य स्वरुप रूप, लावण्य, बल एवं सुदृढ़ शरीर रूपी शरीर की संपत्ति प्राप्त होती है। इस सिद्धि को कायसम्पत् नाम से कहा गया है।
इन्द्रियों की ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय व अर्थवत्त्व इन पांच विभागों में संयम करने से योगी सभी इन्द्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है ।
उन इन्द्रियों पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त करने से योगी का शरीर मन की तरह ही तेज गति वाला, बिना शरीर के इन्द्रियों से काम करने वाला और प्रकृति से बने सभी अंगों पर अधिकार प्राप्त कर लेता है ।
बुद्धि आदि जड़ पदार्थो और आत्मा-जीवात्मा दोनों को पृथक-पृथक मानने वाले योगी का सभी वर्तमान पदार्थों पर अधिकार हो जाता है और उसे सभी पदार्थों का ज्ञान हो जाता है ।
योगी को विशोका नामक सिद्धि से भी वैराग्य हो जाने पर अविद्या आदि पञ्च क्लेशों का नाश हो जाता है । जिससे योगी जीवन मुक्ति हो जाती है ।
उच्च स्थान प्राप्त किसी व्यक्ति या कुल के द्वारा निमन्त्रण मिलने पर योगी को राग, अभिमान या अहंकार नहीं करना चाहिए । ऐसा करने से योग मार्ग से पुनः नीचे गिरने का अवसर उपस्थित हो जाता है ।
क्षण एवं क्षण कि निरंतरता में संयम करने से योगी को विवेकज ज्ञान की प्राप्ति होती है ।
समान जाति, लक्षणों व स्थान से एक ही जैसी दिखने वाली वस्तुओं में विवेकज ज्ञान के द्वारा योगी को भे पृथकता का ज्ञान हो जाता है ।
योगी के स्वयं के योग साधना से प्राप्त सामर्थ्य से उत्पन्न होने वाला, जो सभी पदार्थों के विषयों को उनके सभी कालों भूत, वर्तमान व भविष्य को जानने वाला होता है और यह सब बिना किसी क्रम अर्थात विभाग के ही पैदा होने वाला ज्ञान होता है। ऐसे ज्ञान को विवेकज या विवेक से उत्पन्न ज्ञान कहा जाता है।
जब बुद्धि और जीवात्मा की एक समान रूप से शुद्धि हो जाती है । तब वह कैवल्य या मोक्ष की अवस्था कहलाती है ।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें