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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 25
प्रवृत्त्यालोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥ प्रवृति-आलोक-न्यासात्-सूक्ष्म-व्यवहित-विप्रकृष्ट-ज्ञानम् , ॥
जब योगी द्वारा मन की प्रकाशमय प्रवृत्ति में संयम किया जाता है । तब उसे जो वस्तु या पदार्थ दिखाई नहीं देते, जो किसी आवरण या पर्दे के अन्दर हैं या किसी दूर देश में स्थित हैं । उन सभी वस्तुओं या पदार्थों का उसे भली- भाँति ज्ञान हो जाता है ।
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