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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 34
हृदये चित्तसंवित् ॥ हृदये, चित्त-संवित् ॥
हृदय चक्र अर्थात हृदय प्रदेश में संयम करने से योगी अपने चित्त के स्वरूप को ठीक ठीक जान लेता है ।
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