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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 1
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ देश, बन्ध:,चितस्य‌, धारणा ‌॥
अपने चित्त को किसी भी एक स्थान पर (नाभि, हृदय या माथे पर) बाँधना, लगाना, ठहराना, या केन्द्रित करना धारणा कहलाती है।
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