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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 43
बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥ बहि:-कल्पिता, वृत्ति: महाविदेहा , ततः , प्रकाश-आवरण-क्षय:॥
शरीर के साथ सम्पर्क होते हुए भी मन का शरीर से बाहर के पदार्थों के साथ व्यापार होता है । वह महाविदेहा नामक धारणा कहलाती है । इस धारणा से ज्ञान के प्रकाश पर पड़ने वाले आवरण का नाश हो जाता है ।
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