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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 38
बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥ निबन्ध-कारण-शैथिल्यात, प्रचार-संवेदनात् , च, चित्तस्य, पर-शरीर-आवेश:॥
कर्म के बन्धनों के रुकने से व मन के संस्कारों की गति का अच्छी प्रकार ज्ञान होने पर मन दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर लेता है । यह पर शरीर गमन नामक सिद्धि है।
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