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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 41
श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ॥ श्रोत-आकाशयो:, सम्बन्ध-संयमात् -दिव्यं, श्रोतम् ॥
कानों एवं आकाश के परस्पर सम्बन्ध में संयम करने से योगी के दिव्य श्रोत अथवा सुनने की दिव्य क्षमता की प्राप्ति होती है । जिस शक्ति के द्वारा वह सूक्ष्म से सूक्ष्म शब्दों को भी सहजता से सुनने में सक्षम हो जाता है ।
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