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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 48
ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥ तत:, मनोजवित्वं, विकरणभाव:, प्रधानजय, च ॥
उन इन्द्रियों पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त करने से योगी का शरीर मन की तरह ही तेज गति वाला, बिना शरीर के इन्द्रियों से काम करने वाला और प्रकृति से बने सभी अंगों पर अधिकार प्राप्त कर लेता है ।
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