बुद्धि और पुरुष दोनों स्वरुप से ही एक दुसरे से पुर्णतः भिन्न या अलग- अलग हैं । इन दोनों को अभिन्न अर्थात एक ही मानना ‘भोग’ कहलाता है । इसमें बुद्धि का विपरीत ज्ञान कारण है । इससे भिन्न जो स्वार्थ अर्थात केवल पुरुष के विषय में ही संयम करने से आत्मा का ज्ञान होता है ।
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