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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 53
जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ जाति-लक्षण-देशै:,अन्यताऽनवच्छेदात् ,तुल्ययो:,तत:,प्रतिपत्ति: ॥
समान जाति, लक्षणों व स्थान से एक ही जैसी दिखने वाली वस्तुओं में विवेकज ज्ञान के द्वारा योगी को भे पृथकता का ज्ञान हो जाता है ।
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