जिस प्रकार पूर्व के सूत्रों में चित्त के जो निरोध, समाधि व एकाग्रता परिणाम महर्षि द्वारा कहे गए हैं, उसी प्रकार सभी पंच महाभूतों व इन्द्रियों में होने वाले धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम व अवस्था परिणाम भी समझे जाने चाहिए।
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