न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥
न, च, तत्, सालम्बनम्, तस्य, विषयी-भूतत्वात् ॥
लेकिन योगी को दुसरे व्यक्ति के चित्त के भावों का ज्ञान सामान्य ज्ञान की प्रक्रिया के आलंबन से रहित होता है क्योंकि योगी के संयम का विषय तो दुसरे व्यक्ति का केवल चित्त है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
योगसूत्र के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
योगसूत्र के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।