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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 11
सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ सर्वार्थता , एकाग्रतयो: , क्षय‌ , चित्तस्य , समाधिपरिणाम: ॥
चित्त की योग से अतिरिक्त जो तीन भूमियाँ है, क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त उसका नाश और एकाग्र भूमि का निरन्तर बढ़ते हुए निरुद्ध अवस्था का उदय होना, चित्त के लिए समाधि का परिणाम है।
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