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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 42
कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम् ॥ काय-आकाशयो:, सम्बन्ध-‌संयमात् -लघु-तूल-समापत्ते:, च, आकाश-गमनम् ॥
शरीर व आकाश तत्त्व के परस्पर सम्बन्ध में संयम करने और रुई जैसे बहुत ही हल्के पदार्थों में संयम करने से योगी का शरीर और चित्त उन्ही पदार्थों की तरह हल्का और सूक्ष्म हो जाता है, जिससे उसे आकाश में गमन करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है ।
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