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योगसूत्र • अध्याय 3 • श्लोक 2
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥ तत्र, प्रत्यैक-तानता, ध्यानम् ॥
जहाँ जिस स्थान पर भी धारणा का अभ्यास किया गया है, वहाँ पर उस ज्ञान या चित्त की वृत्ति की एकरूपता या उसका एक समान बने रहना ही ध्यान कहलाता है।
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