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अध्याय 88 — अथ विरुताध्यायः

बृहत्संहिता
47 श्लोक • केवल अनुवाद
पोतको, बाज, शशघ्न, वङ्गुल, मयूर, श्रीकर्ण, चकवा, चाष, अण्डीरक, खञ्जन, तोता, कौआ, तीन प्रकार के कबूतर, भारद्वाज, गर्ताकुक्कुट- ये सभी पक्षी; गदहा; हारियल, गिद्ध-ये दोनों पक्षी; वानर, फेण्ट पक्षी, मुर्गा, करादिक, चटका-ये पक्षी और सभी जन्तु दिनचर होते हैं।
लोमड़ी, उलूकचेटी, छिप्पिका पक्षी, बागल, उल्लू, खरहा- ये सभी जन्तु रात्रिचर होते हैं। ये सभी जन्तु अपने काल का अतिक्रमण कर भ्रमण करें (रात्रिचर दिन में और दिनचर रात्रि में भ्रमण करें) तो देश का नारा और राजा की मृत्यु को सूचित करने बाले होते हैं।
घोड़ा, मनुष्य, साँप, ऊँट, चीता, सिंह, रोछ, गोह, भेड़िया, नेवला, हरिण, कुत्ता, बकरा, गौ, बाघ, हंस, पृषत (मृगजाति), मृग, सियार, बिल में रहने वाले प्राणी, कोयल, बिल्ली, सारस पक्षी, सूअर- ये सभी दिन, रात्रि दोनों में चरने वाले हैं।
भष, कूटपूरी, कुरबक, करायिका- ये पूर्णकूट की पिङ्गलिका, पेचिका, हक्का- ये उलूकचेटी की, कपोतको और स्पामा पोतको को
बञ्जुल खदिरच की, नृपसुता और सुख्तुन्दरी सुच्छुन्दर को, वलिय और गर्दभ गदहे की तथा
स्रोतोभेद्य, तडागभेद्य और कलहकारिका- ये रता को संज्ञाये है। यह रता दो अंगुल की होती है और रात्रि में पृङ्गार की तरह शब्द करती है।
दुर्बलिक भाण्डरीक को कहते हैं। यह भाण्डरीक पूर्व देश-निवासियों
यह भाण्डरीक पूर्व देश-निवासियों के दक्षिण भाग में और अन्य देश-निवासियों के नाम भाग में आने में ४२७ शुभ होता है। धिक्कार मृग जाति को और मुर्गे को कहते हैं।
कुतमस्य एवं गृह गोभिका भित्ति में स्थित मौन की संज्ञा है। पवन, फोड़ और मूकर-वे सूअर की उसो की थी, कुकुर और सारमेये कुत्ते को एवं सूरिकाच जाति की भषकटपूरीति।
इस प्रकार प्रत्येक देश में शकुन के नामों को जानने वाले पण्डितों को शकुन के नामों को जानकर शकुन के शब्दों को जानने के लिये अच्छी तरह विचार कर शाख- कथित फलों से उनका मिलान करना चाहिये ।
बहुल का दीप्त शब्द तितिड़ और पूर्ण शब्द किल्किली है। बाज, तोता, गिद्ध और कङ्क के स्वभाव से विपरीत होने पर दीप्त शब्द होता है।
कबूतर का पाहन, आसन और शय्या पर बैठना तथा घर में प्रवेश करना मनुष्यों के लिये अशुभकारी है। जाति के भेद से फल के समय भी भित्र-भिन्न होते हैं।
जैसे- सफेद वर्ष के कबूतर का फल एक वर्ष में, चित्र वर्ष के कबूतर का फल छः मास में तथा कुङ्कुम और धूध मर्णसदृश कबूतर का फल उसी समय में होता है।
श्यामा पक्षी का चिचित् शब्द पूर्ण, शूलिशूल शब्द शुभ, चन्व शब्द दीप्त और चिचिक् शब्द मित्रलाभ के लिये होता है।
हारीत (हरियल) पक्षी का गुग्गु शब्द पूर्ण और सभी शब्द दीप्त होते हैं तथा भाराज पक्षी के सभी प्रकार के शब्द शुभकारी होते हैं।
करायिका पक्षी का सिष्षिशब्दपूर्ण शब्द सुन और करकर शब्द केवल कल्याण करने वाला, किन्तु अद्धि करने वाला नहीं होता है।
उस करायिका का कोक्ति शब्द क्षेम करने जाता, कटुक्ति शब्द हि करने वाला, कोटिनिर्मल शब्द निष्फल और गुं शब्द दीप्त होता है।
यदि गमन करने वाले के वाम भाग में धन्वन पक्षी हो तो शुभ, उसी बाम भाग में पृथ्वी से एक हाथ ऊँचे प्रदेश पर हो तो इश कार्यों की सिद्धि करने वाला एवं काफी उच्च प्रदेश पर हो तो समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को वश में करने वाला होता है ।
यदि गमन करने वाले के सम्मुख सर्प आ जाय तो शत्रुसमागम तथा बन्धुओं के वध और विनाश को सूचित करता है। यदि गमनसमय में दक्षिण भाग से वाम भाग में सर्व आ जाय तो कार्यसिद्धि के लिये नहीं होता है।
दुःखं भस्मास्यिकाष्ठतुषकेशतृणेषु दृष्टः करोति खलु खञ्जनकोऽब्दमेकम् ॥२०॥ यदि खनन पधी कमाल घोड़ा हाथी और सर्प के मस्तक पर दिखाई दे सो राज्य को देने पाला होता है, पवित्र स्थान या हरो घास पर दिखाई दे तो कुशल करने याला होता है तथा भस्म, हट्टी, काठ, तुर, काल या इन पर दिखाई दे तो एक वर्ष तक दुःख करता है।
तित्तिर पक्षी का किलिकिल्किलि शब्द शान्त तथा शुभ करने वाला और उससे भिन्न शब्द अशुभ करने वाला होता है। यदि खरहा रात्रि में वाम भाग में होकर शब्द करे तो शुभ फल होता है।
वानर का किलिकिलि शब्द प्रदीप्त और गमन करने वाले के लिये शुभप्रद नहीं होता है, परन्तु चुग्तु शब्द शुभप्रद होता है तथा कुलालकुक्कुट का शब्द वानर के समान शुभाशुभ फल देने वाला होता है।
कोड़े, पतंगे, चींटी आदि से भरा हुआ मुख वाला चाप पक्षी जिस मनुष्य के प्रदक्षिण- क्रम से चला जाय या जिस गमन करने वाले के आकाश में स्वस्तिक की तरह चला जाय, उसको शीघ्र हो अधिक घन का लाभ होता है।
काक के साथ लड़ाई करते हुये चाष की काक से दक्षिण भाग में पराजय हो जाय तो गमन करने वाले मनुष्य का चप होता है। इससे विपरीत (काक से उत्तर भाग में चाप की जय) हो तो गमन करने वाले की जय होती है।
यदि चाष वाम पार्श्व में आकर करायिका की तरह 'केका' शब्द करे तो जयकारी होता है। उसका 'क्रक्र' यह दीप्त शब्द कुशलकारी नहीं होता, किन्तु इसका दर्शन गमन करने वाले के लिये सदा शुभप्रद होता है।
अण्डीरक 'टी' शब्द से पूर्ण और 'रिट्टिट्टि' शब्द से दीप्त होता है। यदि फेण्ट पक्षी गमन करने वाले के दक्षिण भाग में स्थित हो तो शुभ होता है, इसके शब्द में और कोई विशेषता नहीं कही गई है।
यदि श्रीकणं पक्षी दक्षिण भाग में स्थित होकर 'क्वक्वक्व' शब्द करे तो शुभ होता है, लेकिन उसी का 'चि‌चिकू' शब्द मध्यम और शेष सभी प्रकार के शब्द निष्फल होते हैं।
गमन करने वाले के बाम भाग में स्थित भाण्डरीक पक्षी का 'चिरिल्विरितु' शब्द हो तो शुभ होता है। यही भाण्डरीक यदि वाम भाग से दक्षिण में आ जाय तो शीघ्र कार्य की सिद्धि करता है।
यदि यही भाण्डरीक पक्षी 'चिश्चिक' शब्द करके गमन करने वाले के माम भाग से दक्षिण भाग में आ जाय तो क्षेम करने वाला होता है, किन्तु अभीष्ट अर्थ की सिद्धि नहीं करता है। इससे उलटा हो (दक्षिण भाग से वाम भाग में आ जाय) तो वप, बन्धन और भय को करता है।
जो मैना 'क्रक्र' शब्द को या भयरहित होकर 'जे' शब्द करे, यह गमन करने पाले के शरीर से शीघ्र रधिर निकलने को सूचित करती है।
यदि गमन करने वाले के वाम भाग में फेण्ट 'चिरिल्चिरितु' शब्द करे तो शुभ फल देने वाला होता है। इसके अतिरिक्त उसके शब्द दीप्त होते हैं।।३१।। बामतो वामभागे फेण्टकश्चिरित्विरित्विति स्यनं शब्दं यदि करोति, तदा शोभनः शुभफलप्रदो निगद्यते कथ्यते। अपरोऽन्यः प्रदीप्त उच्यते कथ्यत इति।
गमन करने वाले के बाम भाग में स्थित गदहा श्रेष्ठ है। यदि वह ओंकार शब्द करे तो गमन करने वाले का हित होता है। इसके अतिरिक्त गदड़े के सभी प्रकार के शब्द दीप्त कहे जाते हैं।
आकार शब्द करने चात्ा कुरङ्ग और मृग तथा ओंकार शब्द करने पाला पृषत पूर्व होता है। शेष शब्द दीप्त होते हैं। च सकुनों के पूर्ण स्वर शुभ और दीप्त स्वर अशुभ होते हैं।
रात्रि में भयभीत हुये मूर्गों के 'कुकुकुकु' शब्दों को छोड़कर शेष सभी प्रकार के शब्द भय देने वाले होते हैं तथा रात्रि के अन्त में स्वस्थ होकर तार स्वर से शब्द करे तो राज्य, पुर और राजा को बुद्धि करने वाले होते हैं।
छिपिका के अनेक प्रकार के शब्द होते हैं, उनमें 'कुलुकुलु' शब्द शुभ नहीं होते, शेष सभी शब्द शुभ होते हैं। मार्जार का शब्द गमन करने वाले के लिये अशुभ होता है तथा गो जाति को छोंक यात्रा करने वाले को मृत्यु को सूचित करती है।
अपनी प्रिया की अभिलाषा करता हुआ उल्लू आनन्द से 'हुहुँगुगुलुक' शब्द करता है। इसका 'कुरुलु' शब्द पूर्ण है। 'किस्किसि' शब्द सदा प्रदीप्त है। जब उल्लू का बार-बार 'बलबल' शब्द हो तो कलह, 'टटट्टट' शब्द दोष करने वाला और शेष सभी शब्द दीप्त होते हैं।
यदि सारस के जोड़े का एक साथ शब्द हो तो इष्ट फल देने वाला होता है। एक सारस का शब्द शुभ नहीं है। यदि एक के शब्द करने के बाद दूसरा देर तक शब्द करता रहे तो भी शुभ देने वाला नहीं होता।
पिङ्गला 'धिरित्विरितु' शब्दों से शुभ करती है। इनसे अन्य सभी शब्द प्रदीत- संज्ञक और अशुभ फल देने वाले होते हैं।
पिङ्गला का 'इशि' शब्द गमन को रोकने वाले और 'कुशुकुशु' शब्द क्लेश करने वाले होते हैं। यह पिंगला अभीष्ट कार्य की सिद्धि को जिस प्रकार सूचित करती है, उस विधि को कहता हूँ।
दिनान्तकालिक सन्ध्या समय में पचित्र होकर नवीन वस्त्र धारण करके उस पिंगला के निवास वृक्ष के समीप जाकर सुगन्धित द्रव्यों (चन्दन, कुङ्कुम, कस्तूरो, अगुरु आदि द्रव्यों से उस वृक्ष का तथा ब्रहा, विष्णु, महेश- इन तीनों देवताओं का पूजन करके
मध्य रात्रि के समय एकाको अग्निकोण में स्थित होकर दिव्य और लौकिक रुपयों में सम्बोधन करते हुये जिस प्रकार से यह सुने, उस प्रकार से यक्ष्यमात्र मन्त्रो के द्वारा पूर्व चिन्तित अर्थ की सिद्धि को पूछना चाहिये ।
हे भद्रे ! मैं जो इस अर्थ को पूछने के लिये आरम्भ कर रहा हूँ, उसको तुम जानती हो। हे कल्याणि! तुम सब वाक्यों को जानने वाली कहीं धोती हो।
आज पूछ कर मैं जाऊँगा, फिर प्रात:काल में जानने बाला मैं आकर अग्निकोण में स्थित होकर पूहूँगा। तुम भी जो मैं पूछता हूँ,
उसको हे कल्याणि । अपनी चेष्टा के द्वारा जिस प्रकार निस्संशय, होकर में जान सकूँ, उस प्रकार कहने के लिये समर्थ हो।
इस प्रकार कहने के बाद वृक्ष के ऊपर बैठी हुई पिङ्गला 'चिरितु इरिलु' शब्द करे तो कार्य को सिद्धि, दिशिकार' और 'कुचाकुच' शब्द उच्चारण करे तो अति आकुलता तथा मौन बैठी रहे तो अभीष्ट अर्थ की सिद्धि होती है।
इसके अतिरिक्त पूर्वकथित दिक्चक्र फल के द्वारा इसका फल कहना चाहिये। यदि पिङ्गला प्रधान शाखा पर बैठी हो तो उत्तम, मध्य शाखा पर बैठी हो तो मध्यम और नीचे वालो शाखा पर बैठी हो तो अल्प फल देने वाली होती है।
बत्तीस से विभक्त दिक्चक्र के नाभि स्थान और नाभि से बाहर भाग में स्थित छिपकली ( गिरगिट) का फल होता है। छछुन्दर को 'चिच्चिड़' शब्द से प्रदीप्त और 'तित्तिङ' शब्द से पूर्ण जानना चाहिये।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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