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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 23
पूर्णाननः श्चाषः प्रदक्षिणमुपैति नरस्य यस्य। खेस्वस्तिकं यदि करोत्यथवा यियासो स्तस्यार्थलाभमचिरात् सुमहत् करोति ॥
कोड़े, पतंगे, चींटी आदि से भरा हुआ मुख वाला चाप पक्षी जिस मनुष्य के प्रदक्षिण- क्रम से चला जाय या जिस गमन करने वाले के आकाश में स्वस्तिक की तरह चला जाय, उसको शीघ्र हो अधिक घन का लाभ होता है।
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