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बृहत्संहिता • अध्याय 88 • श्लोक 45
इत्येवमुक्ते तरुमूर्घगायाश्चिरिल्विरिल्वीति रुतेऽर्थसिद्धिः । अत्याकुलत्वं दिशिकारशब्दे कुचाकुचेत्येवमुदाहते वा ॥
इस प्रकार कहने के बाद वृक्ष के ऊपर बैठी हुई पिङ्गला 'चिरितु इरिलु' शब्द करे तो कार्य को सिद्धि, दिशिकार' और 'कुचाकुच' शब्द उच्चारण करे तो अति आकुलता तथा मौन बैठी रहे तो अभीष्ट अर्थ की सिद्धि होती है।
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